श्यामा प्रसाद मुखर्जी और मुस्लिम लीग का संबंध एक जटिल ऐतिहासिक–राजनीतिक प्रसंग है, जो मुख्य रूप से बंगाल की प्रांतीय राजनीति और फ़ज़लुल हक़ की सरकार के दौर (1941–43) से जुड़ा हुआ है। यह सीधा “जिन्नाह की मुस्लिम लीग से वैचारिक गठजोड़” नहीं था, बल्कि प्रांतीय सत्ता संतुलन, कांग्रेस की रणनीति, ब्रिटिश गवर्नर की भूमिका और बंगाल के हिंदू–मुस्लिम समीकरणों के बीच बना एक अस्थायी राजनीतिक समीकरण था।
पृष्ठभूमि: 1937 के चुनाव और बंगाल की राजनीति
1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद अविभाजित बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी (Krishak Praja Party) के नेता ए.के. फ़ज़लुल हक़ प्रधानमंत्री (Premier) बने, जिन्हें मुस्लिम लीग का भी समर्थन प्राप्त था। कांग्रेस ने यहाँ सरकार बनाने से दूरी बनाई, जबकि मुस्लिम लीग और कृषक प्रजा पार्टी मिलकर ग्रामीण, मुस्लिम–बहुल समाज की राजनीति चला रहे थे।
इसी दौर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो एक शिक्षाविद् और फिर हिंदू महासभा के प्रमुख नेता के रूप में उभर रहे थे, बंगाल में हिंदू समाज की राजनीतिक आकांक्षाओं के प्रतिनिधि माने जाने लगे।
1941: फ़ज़लुल हक़ सरकार, मुस्लिम लीग से अलगाव और नई संयुक्त सरकार
1941 में वायसराय की डिफ़ेन्स काउंसिल के मुद्दे पर मुस्लिम लीग ने फ़ज़लुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे उनकी सरकार अल्पमत में आ गई। इसके बाद ब्रिटिश गवर्नर की कोशिश थी कि किसी रूप में मुस्लिम लीग–प्रधान मंत्रालय बने, लेकिन गणित और समर्थन स्पष्ट नहीं बैठ पाया।
इसी पृष्ठभूमि में फ़ज़लुल हक़ ने एक “प्रोग्रेसिव कोएलिशन” बनाने की कोशिश की, जिसमें उनकी पार्टी के प्रगतिशील धड़े, कुछ कांग्रेस–समर्थक तत्व, प्रमुख हिंदू नेता और हिंदू महासभा के नेता शामिल हुए। इसी गठजोड़ के तहत डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बंगाल का वित्त मंत्री (Finance Minister) बनाया गया और यह सरकार 12 दिसंबर 1941 को अस्तित्व में आई, जिसे कई इतिहासकार “श्यामा–हक़ मंत्रालय” कहते हैं।
“मुस्लिम लीग के साथ” जुड़ाव का सवाल कहाँ से उठा?
राजनीतिक आरोप यह लगते हैं कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने “जिन्नाह की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर” सरकार बनाई। तथ्य यह है कि:
- 1941 की जो नई सरकार बनी, वह फ़ज़लुल हक़ की नेतृत्व वाली “कोएलिशन” थी, न कि मुस्लिम लीग मंत्रालय; मुस्लिम लीग तो पहले ही समर्थन वापस ले चुकी थी।
- यह सही है कि इससे पहले फ़ज़लुल हक़ की पार्टी को मुस्लिम लीग का समर्थन था और वे ‘लाहौर प्रस्ताव’ (Pakistan Resolution, 1940) जैसी अहम घटनाओं से जुड़े रहे, इसलिए बाद की बहसों में इस गठजोड़ को “लीग के साथ जुड़ाव” की तरह पेश किया जाने लगा।
यानी तकनीकी रूप से मुखर्जी सीधे तौर पर जिन्नाह की मुस्लिम लीग सरकार के घटक नहीं थे, लेकिन उन्होंने उस प्रांतीय ढाँचे में काम किया जहाँ पहले लीग का राजनीतिक प्रभाव और गठबंधन मौजूद रहा था; इसी वजह से राजनीतिक विमर्श में दोनों का “जुड़ाव” बार–बार उठाया जाता है।
मुखर्जी का उद्देश्य: मुस्लिम लीग के प्रभाव को संतुलित करना
कई विद्वान और शोध–ग्रंथ यह तर्क देते हैं कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बंगाल मंत्रालय में शामिल होना, बंगाल में बढ़ते मुस्लिम लीग प्रभाव को “काउंटर” करने और हिंदुओं की सुरक्षा–हितों को मज़बूत करने की रणनीति का हिस्सा था।
- मुखर्जी और फ़ज़लुल हक़ की साझेदारी का एक उद्देश्य हिंदू–मुस्लिम तनाव को कम करना और लीग के ध्रुवीकरण वाले एजेंडे को कमजोर करना बताया जाता है।
- बंगाल की राजनीति में लीग का पूर्ण वर्चस्व न बने, इसके लिए हिंदू महासभा, प्रजा पार्टी और कुछ अन्य समूहों के सहारे यह “वैकल्पिक” मंत्रालय खड़ा किया गया।
दूसरे शब्दों में, यह गठबंधन वैचारिक निकटता से ज़्यादा, “संतुलन की राजनीति” और प्रशासन में भागीदारी के माध्यम से प्रभाव बनाए रखने का प्रयास था।
हिंदू महासभा, कांग्रेस और ब्रिटिश गवर्नर की भूमिका
उस समय अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस “क्विट इंडिया” की ओर बढ़ रही थी और प्रांतीय सरकारों में भागीदारी को लेकर विभाजित दृष्टिकोण रखती थी, जबकि हिंदू महासभा और कुछ प्रांतीय दल ब्रिटिश शासन के तहत भी सरकार चलाने के पक्ष में थे।
- बंगाल में हिंदू महासभा का मानना था कि यदि वे सरकार में शामिल न हों तो प्रशासन और क़ानून–व्यवस्था पूरी तरह मुस्लिम लीग–समर्थ ताक़तों के हाथ में चली जाएगी।
- गवर्नर भी ऐसे गठबंधन को तवज्जो देता था जो एक ओर युद्धकालीन (द्वितीय विश्वयुद्ध) ज़रूरतें पूरी कर सके और दूसरी ओर कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद स्थिर प्रशासन दे सके।
इसी त्रिकोणीय समीकरण (ब्रिटिश गवर्नर – प्रांतीय दल – हिंदू महासभा) ने वह परिस्थिति बनाई जिसमें मुखर्जी, फ़ज़लुल हक़ की प्रोग्रेसिव कोएलिशन सरकार में वित्त मंत्री बने।
मुस्लिम लीग से टकराव और मुखर्जी का इस्तीफ़ा
फ़ज़लुल हक़ की इस दूसरी ministry (1941–43) को मुस्लिम लीग ने शुरू से “विरोधी मोर्चा” के रूप में चित्रित किया और लगातार इसकी वैधता और लोकप्रियता पर सवाल उठाए। लीग ने इस सरकार के ख़िलाफ़ तेज़ राजनीतिक अभियान चलाया, जिससे प्रांत में सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो शुरुआत में प्रशासन के माध्यम से संतुलन और स्थायित्व लाने की उम्मीद रखते थे, धीरे–धीरे गवर्नर के हस्तक्षेप, नौकरशाही के दबाव और राजनीतिक टकरावों से असंतुष्ट हो गए। 1942–43 के दौरान उन्होंने गवर्नर की नीति और लीग की उग्र राजनीति की आलोचना की और अंततः 1943 में मंत्रालय से इस्तीफ़ा दे दिया। अपने नोट्स में उन्होंने लिखा कि मुस्लिम लीग ने कई महीनों तक ministry और ख़ासकर फ़ज़लुल हक़ के ख़िलाफ़ उग्र अभियान चलाकर क़ानून–व्यवस्था और साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाया।
क्या यह “जिन्नाह की मुस्लिम लीग से गठबंधन” था?
इतिहास–लेखन में इस विषय पर दो बड़े नैरेटिव मिलते हैं:
- एक धारा यह कहती है कि हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों ने अलग–अलग प्रांतों (बंगाल, सिंध आदि) में एक–दूसरे से व्यावहारिक राजनीतिक समझौते किए और यह कांग्रेस–विरोधी तथा ब्रिटिश–समर्थ (या “सहभागी”) राजनीति का हिस्सा था।
- दूसरी धारा यह तर्क देती है कि बंगाल में “श्यामा–हक़ ministry” मूलतः लीग के प्रभाव को कम करने और हिन्दू–मुस्लिम सहअस्तित्व का वैकल्पिक मॉडल खड़ा करने की कोशिश थी, न कि जिन्नाह की मुस्लिम लीग के साथ सीधा साझेदारी।
तथ्य यह है कि मुखर्जी जिस समय मंत्री बने, उस समय प्रांतीय सरकार मुस्लिम लीग–समर्थ नहीं, बल्कि उससे अलग और कई बार विरोधी रुख़ वाली थी; लेकिन मुस्लिम लीग की पिछली भूमिका और फ़ज़लुल हक़ के साथ उसके रिश्तों के कारण बाद की राजनीति में इसे “लीग से गठबंधन” कहकर सरल बना कर पेश किया गया।
मुखर्जी की वैचारिक स्थिति और बाद की राजनीति
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की वैचारिक पहचान मूलतः राष्ट्रवादी–हिंदू राजनीति, भारतीय एकता और मज़बूत केंद्र के पक्षधर नेता की रही, जिन्होंने बाद में जनसंघ (आज की भाजपा का वैचारिक पूर्ववर्ती) की स्थापना की।
- बंगाल मंत्रालय का उनका अनुभव ब्रिटिश गवर्नर के “प्रांतीय स्वायत्तता” को कमजोर करने वाले रवैये और सांप्रदायिक राजनीति के खतरों के प्रति उनकी चेतावनी को और प्रखर बनाता है।
- विभाजन के समय और उसके बाद जम्मू–कश्मीर, पूर्वी बंगाल के हिंदुओं और राष्ट्रीय एकीकरण के प्रश्नों पर उनका रुख़ मुस्लिम लीग की पाकिस्तान–नीति से बिल्कुल विपरीत और टकरावपूर्ण रहा।
इसलिए ऐतिहासिक रूप से कहा जा सकता है कि मुखर्जी का “जिन्नाह की मुस्लिम लीग के साथ जुड़ाव” प्रत्यक्ष वैचारिक सहयोग की तुलना में, बंगाल की जटिल प्रांतीय राजनीति, ब्रिटिश औपनिवेशिक ढाँचे और विभिन्न दलों के व्यावहारिक गठबंधनों की उपज था, जिसे बाद की राजनीति ने अपने–अपने हितों के अनुसार या तो बढ़ा–चढ़ाकर या बचावात्मक ढंग से व्याख्यायित किया।


